बेद हमारा भेद है, मैं ना बेदन के मांही।
जिस बेद से मैं मिलूं, बेद जानते नाहीं।
भावार्थ है कि चारों पवित्र वेदों में ज्ञान पूर्ण परमात्मा का ही है, परन्तु पूजा की विधि केवल ब्रह्म (ज्योति निरंजन) तक की ही है।
परमेश्वर कबीर (कविर्देव) की पूजा विधि के ज्ञान व तत्वज्ञान के लिए पवित्र वेदों तथा पवित्र गीता जी में कहा है कि उसे
तो कोई तत्वदर्शी संत ही बता सकता है, जो स्वयं ही परमेश्वर होता है या कोई उसका भेजा हुआ वास्तविक प्रतिनिधि होता है। उससे उपदेश प्राप्त करके पूर्ण मोक्ष व परम शान्ति प्राप्त होती है।
जो कविर्देव (कबीर परमेश्वर) तत्वज्ञान लेकर संसार में आता है। वह सर्वशक्तिमान है तथा काल (ब्रह्म) के कर्म रूपी किले को तोड़ने वाला है वह सर्व सुखदाता है तथा सर्व के पुजा करने योग्य है।
ऋग्वेद मण्डल नं. 9 सुक्त नं. 96 मन्त्र 16 में कहा है
मन्त्र 17 में उस परमात्मा का नाम व परिपूर्ण परिचय दिया है।
वेद बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि पूर्ण परमात्मा विलक्षण मनुष्य के बच्चे के रूप में प्रकट होकर कविर्देव अपने वास्तविक ज्ञानको अपनी कबीर बाणी के द्वारा निर्मल ज्ञान अपने हंसात्माओं अर्थात् पुण्यात्मा अनुयाइयों को कविताओं, लोकोक्तियों के द्वारा सम्बोधन करके अर्थात् उच्चारण करके वर्णन करता है। इस तत्वज्ञान के अभाव से उस समय प्रकट परमात्मा को न पहचान कर केवल ऋषि व संत या कवि मान लेते हैं वह परमात्मा स्वयं भी कहता है कि मैं पूर्ण ब्रह्म हूँ परन्तु लोक वेद के आधार से परमात्मा को निराकार माने हुए प्रजाजन नहीं पहचानते जैसे गरीबदास जी महाराज ने काशी में प्रकट परमात्मा को पहचान कर उनकी महिमा कही तथा उस परमेश्वर द्वारा अपनी महिमा बताई थी उसका यथावत् वर्णन अपनी वाणी में किया है

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